दिव्य दम्पति – श्री पेरिय पेरुमाळ् और श्री पेरिय पिराट्टि

श्रीः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः जय श्रीमन्नारायण ।
आऴ्वार् एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणम् ।

पिछले लेख में (https://acharyas.koyil.org/index.php/2013/08/29/introduction-2-hindi/) हमने श्री गुरुपरम्परा के बारे में संक्षिप्त रूप में देखा ।

अब हम सम्प्रदाय प्रवर्तक आचार्य (ओराण् वऴि आचार्य) गुरुपरम्परा प्रारंभ करेंगे ।

ओराण् वऴि का अर्थ हैं ज्ञान को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक परम्परागत (अनुक्रम) प्रदान करना। जैसे हमने पहले देखा की यथार्थ दिव्य सारतम ज्ञान तो रहस्यत्रय में हैं जो हमारे पूर्वाचार्य ने बहुत विचारपूर्वक, विवेकपूर्ण रीती से सम्प्रदाय के अनुयायियों के हितार्थ प्रदान किया है।

ओराण् वऴि गुरुपरम्परा के अन्तर्गत सर्वप्रथम श्री पेरिय पेरुमाळ् और श्री पेरिय पिराट्टि ही आते हैं।

  • श्री पेरिय पेरुमाळ्

periya-perumaal

तिरुनक्षत्र – आवणि रोहिणि (तमिऴ् के आषाढ़ मास, रोहिणी नक्षत्र)

ग्रन्थ सूचि – श्रीमद्-भगवद्-गीता, श्रीशैलेश दयापात्रम् तनियन् ,इत्यादि

हमारी ओराण् वऴि गुरुपरम्परा श्री पेरिय पेरुमाळ् से प्रारंभ होती है। अकारण करुणावरुणालय भगवान् अपने निर्हेकुत कृपा से सर्वप्रथमाचार्य का पद स्वीकार करते हैं और रहस्यत्रय का सदुपदेश अपनी महिषी, जिन्हें पेरुमाळ् ने अपने वक्षस्थल पर बिराजे रखा है, पेरिय पिराट्टि को श्री वैकुण्ठ में देते हैं। एम्पेरुमान् (भगवान्) सबके स्वामी हैं। वे पूर्णतः स्वतन्त्र हैं। समस्त जीव भगवान् पर निर्भर हैं और उनके सेवक हैं। वे प्रथमाचार्य का स्वरूप अपनी इच्छा से स्वीकारते हैं। वे सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्याप्त हैं। अपने कारुण्य स्वभाव से, वे मोक्ष की इच्छा रखने वाले जीवों को मोक्ष प्रदान करते हैं।

पेरिय पेरुमाळ् (भगवान रंगनाथ, जो स्वयं श्रीमन्नारायण ही हैं) अपने स्वधाम (श्री-वैकुण्ठ) से अपने श्रीरंगविमान् में ब्रह्मा जी के लोक मे पधारे जहाँ उन्की पूजा ब्रह्मा जी ने सत्यलोक में की थी। ब्रह्माजी के आग्रह पर भगवान मूर्त रूप वहाँ रहकर ब्रह्माजी से सेवा स्वीकरते रहे, उसके पश्चात वे इक्ष्वाकु वंश के राजा ने ब्रह्माजी से भगवान पेरिय पेरुमाळ् के विग्रह को माँगकर अपनी नगरी अयोध्या लेकर आ गये, और भगवान पेरिय पेरुमाळ, रघुकुल के नृपों (अर्थात राजाओं) के कुल देवता के रूप में पूजे जाने लगे। लंका विजय के पश्चात, राज्याभिषेक के पश्चात, विभीषणजी ने इस विग्रह को राजा श्री राम से माँगकर अपने राज्य लंका ले जाने लगे। पर पेरुमाळ् की इच्छा कुछ और थी। श्री विभीषणजी लंका जाते समय माँ कावेरी में स्थित इस छोटे द्वीप पर रुके, और पेरुमाळ् श्रीरंगम की मनोहर छटा देख, वहीं पर दक्षिणाभिमुखी बिराज गए, इसी लिए कहते है – “वण्डिनम् उरलुम् चोलै, मयिलिनम् आळुम् चोलै, कॊण्डल् मीदणवुम् चोलै, कुयिलिनम् कूवुम् चोलै”

श्री पेरिय पेरुमाळ् तनियन् (ध्यान श्लोक) –

श्रीस्थानभरणं तेजः श्रीरङ्गेशमाश्रये।
चिंतामणि मिवोत्वान्तम् उत्सङ्गे अनन्तभोगिनः॥


 

श्री पेरिय पिराट्टि

तिरुनक्षत्र – पङ्गुनि, उत्रम् (फाल्गुन 

एम्पेरुमान् द्व्यमहामन्त्र का उपदेश पेरिय पिराट्टि को वैकुण्ठ लोक में करते हैं। आचार्य के सद्गुणों का रूपावतार श्री पेरिय पिराट्टि हैं क्योंकि उन्में एक आचार्य के सद्लक्षणों का समावेश है। कहते हैं कि आचार्य में यह तीन गुण होने चाहिए १. जीवों के प्रति कृपा, करुणा, २. पारतन्त्रयम् (अर्थात भगवान पर पूर्ण निर्भरता),  और ३. अनन्यार्हत्वम् (भगवान के अधिकार में रेहना चाहिये)। क्योंकि पेरिय पिराट्टि इन तीन गुणों की अधिकारी हैं, अतः हमारी ओराण् वऴि गुरुपरम्परा के अन्तर्गत दूसरी आचार्य हुईं। इसी का उदाहरण पिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी ने अपने श्रीवचनभूषण में पूरे रूप से बताया है कि वे (पेरिय पिराट्टि – सीता पिराट्टि के रूप में) ये तीन गुण अपने तीन वियोग के द्वारा प्रकट करती हैं।

पहला उदहारण – जब रावण सीता पिराट्टि को अनिच्छा से अपनी लंका ले गया, माता सीता अपनी परमकृपा से इस कृत्य को होने देती हैं, कारण यहाँ आचार्य का यह कहना है श्री सीता पिराट्टि इस अखिल जगत की माँ हैं तो इस प्रकार वे रावण की भी माँ हैं, अगर माता इस कृत्य को नहीं होने देती तो देवस्त्रीयों (अर्थात देवताओं की पत्नियाँ) का उद्धार नहीं होता। अतः वे चुपचाप रावण के अपचारों को एक माँ होने के नाते सहती रहीं। दूसरा उदहारण – श्री सीता पिराट्टी के लंका में रहने के कारण, श्री रामजी को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था, तब मर्यादा पुरषोत्तम श्री रामजी श्री सीतापिराट्टि को गर्भावस्था में वनवास का आदेश देते हैं, और श्री सीता पिराट्टी ने इस आदेश को स्वीकार भी किया, क्योंकि भगवान् श्री रामजी पर, इतनी निर्भर थी (पारतंत्र्य), उनकी भावना थी, भगवान जो कुछ भी कहेंगे वे अपना मस्तिष्क् नमन करते हुए स्वीकार करेंगी।

तीसरा उदहारण – जब वे वनवास से पनरागमन के पश्चात यह सिद्ध करने के लिए कि वे केवल श्री राम की ही पूर्णतः अधिकारिणी (अनन्यार्हत्वम्) हैं और किसी अन्य की नहीं, उन्हें त्यागकर परमपद को प्रस्थान करती हैं।

तो इस प्रकार से पेरिय पिराट्टि में ये तीनों लक्षण पूर्णतया परिलक्षित हैं, जो एक आचार्य से अपेक्षित है ।

पेरिय पिराट्टि तनियन् (ध्यान श्लोक)-

नमः श्रिरङ्ग नायक्यै यत् ब्रो विभ्रम भेततः।
ईशेशितव्य वैशम्य निम्नोन्नतम् इदं जगत्॥

आधार – 

Divya Dhampathi

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